रफी बनाम किशोर
किशोर दा और रफी साब में कौन बड़ा? आज इस बात को लेकर अक्सर बहस होती है । लेकिन ये ऐसा विषय है जिसमें सीधे तौर पर किसी का जीत पाना मुश्किल ही नही नामुमकिन है। यूनीवार्ता के तेज तर्रार पत्रकार विनोद विप्लव इस विषय पर कम से कम एक दशक से काम कर रहे हैं । फिल्मों में गहरी रुचि और विषय की परख का अंदाजा इनकी लेखनी से आप खुद लगा लेंगे । आज वो संगीत की दुनिया को दोनो महारथियों की तुलना कर रहे हैं ।
मोहम्मद रफी और किशोर कुमार में से कोई भी हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी आवाज का जादू बरकरार है और तब तक बरकरार रहेगा जब तक इंसान के पास श्रवण क्षमता रहेगी। मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज के जरिये वर्षों तक संगीत प्रेमियों पर राज किया जबकि किशोर कुमार ने गायन के साथ साथ अभिनय कला एवं निर्देशन के क्षेत्र में भी अपनी छाप छोड़ी। ऐसे में दोनों के बीच किसी तरह की तुलना आसान नहीं है, लेकिन मै इसका दुस्साहस कर रहा हूं। किशोर कुमार भारतीय फिल्म उद्योग के अत्यन्त प्रतिभावान और प्रभावशाली शख्सियत थे। वह ऐसे जीनियस थे जिनसे फिल्म निर्माण का कोई भी क्षेत्रा अछूता नहीं था। चाहे गायन हो, संगीत निर्देशन हो, फिल्म निर्दशन हो, फिल्म निर्माण हो अथवा अभिनय हो हर क्षेत्रा में अपनी नहीं हैं। गीतों की संख्या के आधार पर निश्चित तौर पर किशोर कुमार से मोहम्मद रफी काफी आगे हैं, लेकिन आज के समय में, खास तौर पर युवा पीढ़ी में किशोर दा के गाए गए गीत रफी साहब के गाये हुए गीतों से कहीं अधिक लोकप्रिय है, लेकिन अगर दोनों के गाए गीतों के शब्दों या शायरी की खूबसूरती पर नजर डालें तो भी रफी साहब बड़े नजर आएंगे। इसके अलावा जहां तक गीतों में भावनाओं और संवेदनाओं का सवाल है रफी साहब न केवल किशोर दा से, बल्कि फिल्मी दुनिया के हर गायकों से अव्वल रहेगें।
केवल एक ही भाव में हो सकता है कि किशोर कुमार रफी को पछाड़ दें और वह है कॉमेडी। कुछ गाने जैसे `ये रात ये मौसम´ और `देखा एक ख्वाब को तो´ को छोड़ दिया जाए तो किशोर कुमार खालिस रोमांटिक गीतों में ज्यादा प्रभावी नहीं लगते हैं और दर्द भरे गीतों में भी किशोर का `दुखी मन मेरे´ एक अपवाद ही लगता है। शास्त्रीय धुनों में किशोर कुमार के ज्यादा गीत नहीं सुने गए हैं। आज कर्णभेदी शोर वाले अश्लील गीत ही फिल्म संगीत की पहचान बने गये हैं। अगर आप कुछ मटकती हुई नंगी कमर को किसी भी कानफाडू गाने के साथ मिला दें तो आपका वीडियो हिट हो जाएगा।
गीतों को रचने के नाम पर पुराने गीतों की नकल हो रही है। आज ए- आर- रहमान जैसे रीमिक्स कलाकार को ही बड़े से बड़े आयोजनों और बड़ी से बड़ी फिल्मों के लिये संगीत बनाने की जिम्मेदारी सौपी जाती है जबकि इनसे कहीं बेहतर कलाकार जैसे नौशाद साहब या खैय्याम जैसे पुराने एवं मंजे हुए संगीतकारों को कोई पूछता नहीं है, वैसे समय में रफी साहब के सुरीले और कर्णप्रिय गानों को तो छोडि़ये, किशोर दा के अर्थपूर्ण और मधुकर गीतों को भी पसन्द करने वाले कम ही लोग बचे हैं। हालांकि उनके कॉमेडी और तेज गति वाले गानों की मांग युवा पीढ़ी में आज भी बनी हुई है। रफी साहब की सबसे बड़ी खूबी गीतों को गाने की उनकी विशिष्ट शैली थी, जबकि किशोर दा के गीतों की खूबी उनके गाने की सामान्य शैली थी। रफी के गाये हुए ज्यादातर गानों को सुनकर ऐसा लगता है कि वह गीत कोई विशिष्ट गायक गा रहा है। इसी तरह की विशिष्टता के- एल- सहगल की थी।
किशोर कुमार के गाये हुए ज्यादातर गानों को सुनकर ऐसा लगता है कि हमारे बीच का ही कोई व्यक्ति उसे गा रहा है। यही किशोर दा की लोकप्रियता का राज है। किशोर कुमार की सबसे बड़ी खासियत यही थी कि उन्होंने कठिन से कठिन गीतों को भी इस तरह से गाया कि सुनने वालों को ऐसा लगे कि वह भी यह गीत गा सकता है। दूसरी तरफ रफी साहब के सामान्य गीतों को गाना भी काफी मुश्किल होता है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान यह देखा गया है कि गीत-संगीत के कार्यक्रमों एवं प्रतियोगिताओं में ज्यादातर गायक किशोर कुमार के गाये हुए गीतों को गाना अधिक पसन्द करते हैं।