Thursday, April 5, 2007

रफी बनाम किशोर

किशोर दा और रफी साब में कौन बड़ा? आज इस बात को लेकर अक्सर बहस होती है । लेकिन ये ऐसा विषय है जिसमें सीधे तौर पर किसी का जीत पाना मुश्किल ही नही नामुमकिन है। यूनीवार्ता के तेज तर्रार पत्रकार विनोद विप्लव इस विषय पर कम से कम एक दशक से काम कर रहे हैं । फिल्मों में गहरी रुचि और विषय की परख का अंदाजा इनकी लेखनी से आप खुद लगा लेंगे । आज वो संगीत की दुनिया को दोनो महारथियों की तुलना कर रहे हैं । मोहम्मद रफी और किशोर कुमार में से कोई भी हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी आवाज का जादू बरकरार है और तब तक बरकरार रहेगा जब तक इंसान के पास श्रवण क्षमता रहेगी। मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज के जरिये वर्षों तक संगीत प्रेमियों पर राज किया जबकि किशोर कुमार ने गायन के साथ साथ अभिनय कला एवं निर्देशन के क्षेत्र में भी अपनी छाप छोड़ी। ऐसे में दोनों के बीच किसी तरह की तुलना आसान नहीं है, लेकिन मै इसका दुस्साहस कर रहा हूं। किशोर कुमार भारतीय फिल्म उद्योग के अत्यन्त प्रतिभावान और प्रभावशाली शख्सियत थे। वह ऐसे जीनियस थे जिनसे फिल्म निर्माण का कोई भी क्षेत्रा अछूता नहीं था। चाहे गायन हो, संगीत निर्देशन हो, फिल्म निर्दशन हो, फिल्म निर्माण हो अथवा अभिनय हो हर क्षेत्रा में अपनी नहीं हैं। गीतों की संख्या के आधार पर निश्चित तौर पर किशोर कुमार से मोहम्मद रफी काफी आगे हैं, लेकिन आज के समय में, खास तौर पर युवा पीढ़ी में किशोर दा के गाए गए गीत रफी साहब के गाये हुए गीतों से कहीं अधिक लोकप्रिय है, लेकिन अगर दोनों के गाए गीतों के शब्दों या शायरी की खूबसूरती पर नजर डालें तो भी रफी साहब बड़े नजर आएंगे। इसके अलावा जहां तक गीतों में भावनाओं और संवेदनाओं का सवाल है रफी साहब न केवल किशोर दा से, बल्कि फिल्मी दुनिया के हर गायकों से अव्वल रहेगें।

केवल एक ही भाव में हो सकता है कि किशोर कुमार रफी को पछाड़ दें और वह है कॉमेडी। कुछ गाने जैसे `ये रात ये मौसम´ और `देखा एक ख्वाब को तो´ को छोड़ दिया जाए तो किशोर कुमार खालिस रोमांटिक गीतों में ज्यादा प्रभावी नहीं लगते हैं और दर्द भरे गीतों में भी किशोर का `दुखी मन मेरे´ एक अपवाद ही लगता है। शास्त्रीय धुनों में किशोर कुमार के ज्यादा गीत नहीं सुने गए हैं। आज कर्णभेदी शोर वाले अश्लील गीत ही फिल्म संगीत की पहचान बने गये हैं। अगर आप कुछ मटकती हुई नंगी कमर को किसी भी कानफाडू गाने के साथ मिला दें तो आपका वीडियो हिट हो जाएगा। गीतों को रचने के नाम पर पुराने गीतों की नकल हो रही है। आज ए- आर- रहमान जैसे रीमिक्स कलाकार को ही बड़े से बड़े आयोजनों और बड़ी से बड़ी फिल्मों के लिये संगीत बनाने की जिम्मेदारी सौपी जाती है जबकि इनसे कहीं बेहतर कलाकार जैसे नौशाद साहब या खैय्याम जैसे पुराने एवं मंजे हुए संगीतकारों को कोई पूछता नहीं है, वैसे समय में रफी साहब के सुरीले और कर्णप्रिय गानों को तो छोडि़ये, किशोर दा के अर्थपूर्ण और मधुकर गीतों को भी पसन्द करने वाले कम ही लोग बचे हैं। हालांकि उनके कॉमेडी और तेज गति वाले गानों की मांग युवा पीढ़ी में आज भी बनी हुई है। रफी साहब की सबसे बड़ी खूबी गीतों को गाने की उनकी विशिष्ट शैली थी, जबकि किशोर दा के गीतों की खूबी उनके गाने की सामान्य शैली थी। रफी के गाये हुए ज्यादातर गानों को सुनकर ऐसा लगता है कि वह गीत कोई विशिष्ट गायक गा रहा है। इसी तरह की विशिष्टता के- एल- सहगल की थी। किशोर कुमार के गाये हुए ज्यादातर गानों को सुनकर ऐसा लगता है कि हमारे बीच का ही कोई व्यक्ति उसे गा रहा है। यही किशोर दा की लोकप्रियता का राज है। किशोर कुमार की सबसे बड़ी खासियत यही थी कि उन्होंने कठिन से कठिन गीतों को भी इस तरह से गाया कि सुनने वालों को ऐसा लगे कि वह भी यह गीत गा सकता है। दूसरी तरफ रफी साहब के सामान्य गीतों को गाना भी काफी मुश्किल होता है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान यह देखा गया है कि गीत-संगीत के कार्यक्रमों एवं प्रतियोगिताओं में ज्यादातर गायक किशोर कुमार के गाये हुए गीतों को गाना अधिक पसन्द करते हैं।
संगीत की महफिलों में नये कलाकारों को रफी के गीत गाने में मुश्किल होती है। के- एल- सहगल, तलत महमूद, हेमन्त कुमार और मुकेश के भावपूर्ण गीतों को गाना तो और भी मुश्किल होता है और इसलिये उनके गीतों की नकल करने वाले कम ही गायक पैदा हुए। इन गायकों के गीतों को रीमिक्स नहीं किये जाने का कारण यह भी है कि उन गीतों की नकल हो ही नहीं सकती। इसी कारण से रफी के रीमिक्स किये गये गीतों की संख्या भी कम है। कल्पना की जा सकती है कि `ओ दुनिया के रखवाले´, `मधुबन में राधिका नाचे रे´, `देखी जमाने की यारी´ और `जाने क्या ढूंढती रहती है ये आंखें मुझमें´ जैसे गीतों की रीमिक्स बनाने की कोशिश किस कदर हास्यास्पद एवं भद्दी लगेगी। यहां तक कि `पर्दा है पर्दा´, `ओ मेरी महबूबा´ और `आ आ आ जा´ जैसे रफी के गाये हुए गैर शास्त्राीय गीतों को भी रीमिक्स करने के लिये अच्छे गायक नहीं मिलते। पचास और साठ के दशक के उनके अधिकांश गीतों को रीमिक्स नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर किशोर कुमार के गाये `रूप तेरा मस्ताना´ वाले गीत की रीमिक्स अगर असल गाने से बेहतर नहीं तो उसके बराबर तो थी ही। यह रीमिक्स काफी हिट भी हुई। यह सही है कि इस गीत का संगीत देने वाले आर- डी- बर्मन अत्यन्त प्रतिभाशाली थे और उन्होंने फिल्म संगीत को एक नयी दिशा दी। लेकिन उनकी प्रतिभा उनके पिता एस- डी- बर्मन से सुर की मिठास के मामले में आधी भी नहीं है। फिर भी लोग एस- डी- बर्मन को लगभग भूल ही गए है, क्योंकि `ये दुनिया अगर मिल भी जाए´, और `जलते हैं जिसके लिए´ जैसे उनके गीतों को रीमिक्स नहीं किया जा सकता।
रफी के गाने संगीत या रिद्म के अलावा आवाज की जादूगरी पर आधारित थे। अब हम वही आवाज और प्रभाव दोबारा पैदा नहीं कर सकते। रफी के ज्यादातर गीतों में बेहतरीन गायकी, अद्भुत लयबद्धता, जटिलता और अभिनय की कला का समावेश था। खुद किशोर कुमार ने कहा था, ``रफी साहब एक महान गायक हैं। जिस श्रेष्ठता के साथ उन्होंने कुछ दशकों तक फिल्म जगत में राज किया उस तरह से कोई दूसरा नहीं कर सकता है।´´ रफी के गीतों को गाना मुश्किल इसीलिए है क्योंकि रफी में विस्तृत लयबद्धता का गुण था। रफी ने अपनी इस क्षमता का भरपूर प्रयोग किया था। इसके अलावा उन्होंने अपने गीतों में अपनी आत्मा भी डाल दी थी। नौशाद के अनुसार रफी ही अपने सबसे बड़े आलोचक थे। कई बार वे उनसे (नौशाद साहब से) कहा करते थे कि वह गाने से संतुष्ट नहीं हैं। रफी साहब गीत की रिकार्डिंग को `ओके´ कर दिये जाने के बाद भी वह उस गाने को दोबारा गाना चाहते थे और उन्होंने कई गाने दोबारा गाए। रफी साहब को कुदरत ने ऐसी नियामत बख्शी कि वह अपनी आवाज को बखूबी उसी तरह ढालते थे जिसके लिए वह गाना गा रहे होते थे। यह एक ऐसी कला थी जो उनसे बेहतर कोई नहीं जानता था। आप सुनकर बता सकते थे कि गाना देव आनन्द, दिलीप कुमार, धर्मेंन्द्र, शम्मी कपूर या जॉनी वॉकर के लिए है। कोई भी गायक जो अपने आप में ईमानदार है वह स्टेज पर रफी के गाये गीत गाने से पहले दो बार जरूर सोचेगा। उस भाव, लय और परिपक्वता की हूबहू नकल असंभव है। आज कितने ऐसे गायक हैं जो रफी की आवाज की उत्कृष्टता और सम्पूर्णता के करीब भी आते हो। आज के एक प्रतिभाशाली संगीत समायोजक और अरेंजर का कहना है, ``रफी साहब के अधिकतर गानों को हम जैसे `नश्वर´ गाने के लायक नहीं है। हमें सिर्फ उन्हें सुनना चाहिए और उनका कृतज्ञ होना चाहिए।´´ -
विनोद विप्लव का यह आलेख साची प्रकाशन की जल्दी ही छपने वाली किताब - मेरी आवाज सुनो - में शामिल है।

9 comments:

Sagar Chand Nahar said...

कमाल का लेख।
इतना सुन्दर लेख लिखने के लिये आपको हार्दिक बधाई।
रफी साहब की तुलना वाकई दुनियाँ के किसी गायक से नहीं की जा सकती। किशोर दा भी बहुत अच्छे गायक थे परन्तु मुझे किशोर दा गायक जरा कम पसन्द आये। ऐसा नहीं है कि किशोरदा अच्छे गायक नहीं थे पर अपनी अपनी रुचियॊं की बात है यह तो।
आपने किशोरदा के एक गाने का जिक्र किया कि यह गाना अपवाद लगता है ऐसा नहीं है किशोरदा ने और भी बहुत से खूबसूरत गीत गाये हैं जैसे " जिन्दगी के सफर में गुजर जाते हैं वो मकाम", "आ चल के तुझे मैं लेकर चलूं", "छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा"," जीने की दुवायें क्यूं मांगू- मरने की तमन्ना कौन करे"' आदि।
किशोरदा बतौर अभिनेता, संगीत निर्देशक, फिल्म निर्देशक ज्यादा अच्छे लगते हैं मुझे। उस दौर के सभी गायक एक से बढ़कर एक थे सभी महान थे और उनमें किसी एक की दूसरे से तुलना कीजानी असंभव है। जैसे तलत महमूद मखमली आवाज के मालिक थे तो हेमन्त कुमार जैसे कोई पुजारी मन्दिर में भजन गा रहा हो और मन्ना डे शास्त्रीय संगीत के बादशाह हैं तो महेन्द्र कपूर सदाबहार हैं और रोमेंटिक गाने खूबसूरती से गाते हैं/थे।
टिप्पणी नहुत लम्बी हो चली है शेष फिर कभी... इस विषय पर चिट्ठा जगत में लेखों का अकाल है आप से अनुरोध है कि इस कड़ी को आगे बढ़ायें और हमारी वांचन भूख को मिटायें।
धन्यवाद
www.nahar.wordpress.com

Sagar Chand Nahar said...

अरे आपका हिन्दी चिट्ठा जगत में स्वागत करना तो रह ही गया....
आपका स्वागत है मिहिर जी। नारद पर जुड़ गये हैं आप देखिये स्वागत करने वालों की फौज आ रही है पीछे- पीछे। :)

eSwami said...

हिंदी चिट्ठाकारी में आपका स्वागत है.

यह एक शानदार लेख है. भप्पी लहरी के "आई एम अ डिस्को डांसर" काल के बाद दोबारा कर्णप्रिय धुनों का काल शुरु हुआ था. रिमिक्स का समय भी पूरा होने वाला है! ये एक चक्रिय प्रक्रिया है - अच्छे के बाद बुरा और फ़िर अच्छा.

rational india said...

However Mohammad Rafi was a great singer but any body should not allowed to hurt the feelings of the fans of Kishore Da.

Priya Ranjan Jha said...

swagat hai chhote. chalo is kone mein bhi mulakat hoti rahegi. keep it up.

screen india said...

many blog readers want to know some details about the book-Meri Awaj suno. I am happy to know this.
Meri Awaj Suno is a biographical book based on the life and music of Mohammad Rafi. This book in final stage of Printing.
Any body wants to know more about this book or wants to get its copy,can contact me any time on my Phone.
My Phone No. - 09868793203 (Delhi)
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www.vinodviplav.bloghi.com

bablu said...

आज ए- आर- रहमान जैसे रीमिक्स कलाकार को ही बड़े से बड़े आयोजनों और बड़ी से बड़ी फिल्मों के लिये संगीत बनाने की जिम्मेदारी सौपी जाती है जबकि इनसे कहीं बेहतर कलाकार जैसे नौशाद साहब या खैय्याम जैसे पुराने एवं मंजे हुए संगीतकारों को कोई पूछता नहीं है,

आपकी ये बात न सिर्फ ग़लत है बल्कि बचकानी भी है। जिस रहमान के संगीत की समझ की तारीफ खुद नौशाद सा'ब आज से 15 साल पहिले (तब रहमान को शायद कम ही लोग जानते थे) कर चुके हैं उसे आप सिर्फ रीमिक्स कलाकार बता रहे हैं !!! सरजी, रहमान भारतीय फिल्मोद्योग में आज के दौर के का सबसे जीनियस संगीतकार हैं।

ऐसे में मैं सिर्फ एक ही बात कहना चाहूंगा कि या तो आपने रहमान को ठीक से सुना नहीं है या फिर आपको संगीत की समझ नहीं है।

कृपया इसे अन्यथा न लें, ये तथ्यात्मक बात है। अगर ऐसी ग़लतियों से बचा जाये तो आपकी पुस्तक की विश्वनीयता और लोकप्रियता बढ़ेगी।

rational india said...

बबलु जी
आपके कामेंट पढ़कर ऐसा लगता है कि आप रहमान साहब के अंध भक्त है। हो सकता है कि आपको ए आर रहमान के गीत पुराने समय के नौ\शाद, ओपी नैयर, मदन मोहन और एस डी बर्मन जैसे संगीतकारों के गीतों से ज्यादा पसंद हो। इसमें कोई बुराई नहीं है। अपनी -- अपनी पसंद है। वैसे भी आज की पीढी को अतीत के चीजों से ज्यादा वास्ता रहा नहीं है। क्योंकि आज डूबते हुये या डूब चुके सूरज को कौन पूछता है। नई पीढी के कई लोगों ने तो पुराने संगीततकारों के नाम भी \शायद नहीं सुने होंगे उनके गीत सुनना तो दूर की बात है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पुराने समय के संगीतकार और गायक बेकार थे। मेरा कहने का यह भी मतलब नहीं कि ए आर रहमान में कोई संगीत प्रतिभा नहीं है लेकिन क्या वह मदन मोहन, नौ\शाद, \शंकर जयकि\शन और ओ पी नैयर के संगीत की तुलना में अधिक कालजयी गीत दिये हैं। भई इतिहास कोई दस बीस साल का नहीं होता हजारों साल का होता है। रहमान के गीत तो दस साल में ही लोगों के दिलो दिमाग से उतरने लगे हैं अगले दस साल में उनके गीतों को याद करने वाला कोई बचेगा या नहीं यह कौन जानता है दूसरी तरफ नौ\शाद जैसे संगीतकारों के रचे संगीत का जादू समय बीतने के साथ बढ़ता ही जा रहा है। कालजयी गीत रचना ऐसे बैसे संगीतकारोंव\श की बात नहीं है। यह नौ\शाद और एस डी बर्मन सरीखे संगीतकारों की बात हैजो पैसे और नाम कमाने के लिये संगीत की दुनिया में नहीं आये। वे इसलिये इस क्षेत्र में आये क्योंकि संगीत उनके खून में था।

adil farsi said...

बधाई ऐसे लेख के लिये अद्वितय मुहम्मद रफ़ी कि तुलना किसी भी गायक से नही की जा सकती है ऐसा लगता था उनके गाये गीतो को सुन कर जैसे स्वर्ग से सुर लहरिया आ रही हो और सुन ने वाला अपनी सुधबुध खो बैठा हो. इसीलिये तो संगीतकार वसंत देसाई ने कहा था इन्द्र के दरबार का रुठा हुआ शापित गन्धर्व है रफ़ी /